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Tuesday, July 23, 2013

चल मुसाफिर


इन सुनसान गलियों में,
क्यों ढूँढता है अजनबी,
जीने का इरादा तो था,
पर मौत के बहाने ढूँढ़ते है!!

ऐ मुसाफिर सुन भी ले,
क्यों राह तक रहा है तू?
उन सुनसान रास्तो का,
है मर्ज़ भी यहीं कहीं!!

चल पढ़ निकल तू भी कहीं,
यह रास्ते तेरे नहीं,
है मंजिलें अलग तेरी,
तू चल युहीं, तू चल युहीं!!

कुछ पूछते कुछ बूझते,
है फ़िक्र भी उन्हें कोई,
तू किसलिए थमा हुआ?
निकल अभी, निकल अभी!!

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